”जिसने समय रहते समय को पकड़ लिया, उसे कोई कभी पीछे नहीं कर सकता” – डॉ. प्रदीप के. सिन्हा 0

कार्यक्रम का संदर्भ

 ये जून, 2018 को आयोजित लाइक-शेयर-कमेंट का 27 वां एपिसोड था। कंसोल समूह के सह-संस्थापकसीईओ और कर्मचारी विशेष अतिथि के स्वागत के लिए तैयार थे। डॉ प्रदीप के सिन्हाकुलपति और अंतर्राष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान नया रायपुर (आईआईआईटी-एनआर) के निदेशक डॉ. सिन्हा पहुंचे और कंसोल ग्रुप के डायरेक्टर्स के साथ विस्तृत चर्चा की. इसके बादउन्होंने लगभग 20 कंसोलर्स की एक सभा में अपने जीवन के अनुभव साझा किए।

 

डॉ. पीके सिन्हा की सभा के मुख्य अंश

 जीवन से सीखा एक बात यह है कि समय हमेशा होता हैयह सिर्फ यह है कि आप इसे कैसे प्रबंधित करते हैं। मैं कुछ जीवन-परिवर्तनकारी अनुभवों को साझा करना चाहता हूंजिसने मुझे अपने जुनून का पालन करने की इजाजत दी। “ 

डॉ. प्रदीप के सिन्हा के इन शब्दों के साथ लाइक-शेयर-कमेंट का स्मरणीय 27 वां प्रकरण शुरू हुआ। IIT में सफर कम्प्यूटर साइंस से इंजीनियरिंग करने के बाद प्रदीप को ONGC में नौकरी मिली.नौकरी भी ऐसी जगह जहां ऑफिस में समय गुजारने के बाद ज्यादा कुछ करने को नहीं होता था..नौकरी था असम के ऑयल रिफाइनरी प्लांट में.जहां नौकरी से आने और शनिवार-रविवार की छुट्टी के बाद का पूरा समय यूं ही चैटिंग या मूवी देखने में गुजार देते प्रदीप गुजार देते..

 टाइम टेबल ने दिया लाइफ का यू-टर्न

एक दिन यूं ही प्रदीप ने सोचा कि क्यों न वो नौकरी के अलावा अपने खाली समय को घंटों और दिनों के हिसाब से काउंट करें.प्रदीप ने एक टाइम टेबल बनाया नौकरी से आने के बाद वीक ऑफ और सरकारी छुट्टियों को एक साथ काउंट किया.और रिजल्ट सामने आया उसे देखकर वो कुर्सी से उछल पड़े क्योंकि प्रदीप ने पाया कि वो साल के 365 दिनों में मात्र 181 दिन ही काम कर रहे हैं और 184 दिन उनका समय वेस्ट हो रहा है..बस यही वो पल था जिसने प्रदीप के जीवन में वो परिवर्तन लाया.जिसके कारण आज दुनिया उन्हें सलाम कर रही है..प्रदीप ने उस दिन ठाना कि वो अब बचे हुए समय का उपयोग करते हुए एक बुक लिखेंगे.संदीप ने खाली समय में बुक लिखी जिसका नाम था फंडामेंटल ऑफ कम्प्यूटर.आगे चलकर ये बुक बेस्ट सेलर में नॉमिनेट हुई.बुक के फेमस होने के बाद प्रदीप को लगा कि अब आगे क्या..

 जिंदगी का सबसे बड़ा तजुर्बा

इसी बीच उन्हें जापान में ट्रेनिंग के लिए भेजा गया.जहां उन्होंने एक ख्याति प्राप्त कंपनी में ट्रेनिंग की..जब प्रदीप ट्रेनिंग कर रहे थे तभी उनकी कार्यकुशलता और ज्ञान से प्रभावित होकर जापान की यूनिवर्सिटी ने उन्हें पीएचडी प्रोग्राम के लिए अप्रोच किया.मौका अच्छा था,लेकिन भाषा की समस्या आड़े आती.लेकिन प्रदीप ने इसे भी एक चैलेंज माना और जापान में रहकर न सिर्फ अपनी पीएचडी पूरी की बल्कि ट्रेन के सफर के दौरान अपनी पीएचडी और पढ़ाई के नोट्स जरिए एक और बुक लिखी.ये बुक भी पूरे विश्व में काफी लोकप्रिय हुई.इस बुक के लिए डॉ प्रदीप को दूसरे बेस्ट लेखक के सम्मान से नवाजा गया. जापान में काम के दौरान ही उन्हें भारतीय कंपनी CDAC से बुलावा आया. लाइक शेयर कमेंट के जरिए डॉ प्रदीप ने बताया कि किस तरह से सीडैक में काम करने के दौरान उन्हें IIIT को स्थापित करने के लिए एक बार फिर कॉल आया.एक बड़ी कंपनी को छोड़कर नई जगह आना थोड़ा मुश्किल था..लेकिन एक बार फिर सिन्हा ने दिल की सुनी. सीडैक से इस्तीफा दिया और मन में प्रण लिया कि पीछे मुड़कर नहीं देखूंगा.चाहे जो हो जाए. इसके बाद डॉ प्रदीप ने IIIT को न सिर्फ स्थापित किया बल्कि आज अच्छे संस्थानों में इसकी गिनती की जाती है.

 लाइक शेयर कमेंट सेशन के बाद प्रतिक्रिया

कंसोलर्स ने डॉ प्रदीप की हर बात को संजीदगी से सुना और तालियों के साथ उनका अभिवादन किया.डॉ प्रदीप ने अपने जीवन के उन बहुमूल्य पलों को लाइक कमेंट्स शेयर में साझा किए.इस सेशन के बाद कंसोल ग्रुप मेंबर्स के साथ डॉ प्रदीप सिन्हा ने तस्वीरें भी खिंचवाईं और फोटो सेशन के बाद उन्हें ग्रुप की तरफ से स्मृति चिन्ह भेंट किया गया.

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